आग का त्रिकोण: अमेरिका, ईरान और इज़राइल की पुरानी ग़लतियों की महागाथा


"इतिहास कोई संयोग नहीं है। यह मनुष्यों के लालच, भय, और कल्पनाओं का बुना हुआ वह जाल है जिसमें हम सब फंसे हैं — और जिसे हम स्वयं ही बुनते रहते हैं।"

 

प्रस्तावना: तीन कहानियाँ, एक आग

जब हम आज मध्य-पूर्व की ओर देखते हैं — जलते हुए शहर, गिरते हुए बम, और बातचीत की मेज़ पर टूटते हुए समझौते — तो हम अक्सर यह सोचते हैं कि यह सब "अचानक" हुआ। लेकिन मानव जाती की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही है: वह वर्तमान को देखता है और अतीत को भूल जाता है।



यह कहानी तीन सभ्यताओं की है।

एक ओर है ईरान — प्राचीन फ़ारस का उत्तराधिकारी, साइरस महान और दारायवहुश (डेरियस) की भूमि, जिसने इतिहास के पहले वैश्विक साम्राज्यों में से एक का निर्माण किया और हजारों वर्षों से मध्य पूर्व की राजनीति और सभ्यता को आकार दिया, जिसने इस्लाम को अपनी संस्कृति में ढाला, और जो आज भी अपने "महानता के स्वप्न" में जी रहा है।

दूसरी ओर है इज़राइल — एक ऐसा राष्ट्र जिसे 2,000 वर्षों की यातना, प्रवास और नरसंहार के बाद 1948 में बनाया गया। एक ऐसा राष्ट्र जिसकी पहचान उसके अस्तित्व के संघर्ष से जुड़ी है।

और तीसरी ओर है अमेरिका — 20वीं सदी का वह महाबली जिसने सोचा कि वह पूरी दुनिया को अपनी कहानी के अनुसार लिख सकता है।

जब ये तीनों अपनी-अपनी "महागाथा" लेकर टकराए, तो जो आग जली — वह आज भी बुझी नहीं है।


भाग एक: वह क्षण जब सब कुछ शुरू हुआ (1900–1948)

तेल, साम्राज्य और धोखे का जन्म


20वीं सदी की शुरुआत में ईरान एक ऐसी भूमि थी जो कमज़ोर थी, लेकिन उसके नीचे की ज़मीन सोने से भी ज़्यादा क़ीमती थी — तेल।

1908 में जब ब्रिटेन ने ईरान में तेल खोजा, तो उसने एक ऐसी कंपनी बनाई जिसे Anglo-Persian Oil Company के नाम से जाना गया। जिसका मुनाफ़ा ब्रिटेन के पास जाता था और ईरान को रोटी के टुकड़े मिलते थे। यह पहला धोखा था। और ईरानी जनमानस ने इसे कभी नहीं भुलाया।

इसी दौरान, यूरोप में यहूदियों का नरसंहार हो रहा था। जिसमें 60 लाख यहूदी मारे गए। इस घटना ने एक पूरी क़ौम को यह विश्वास दिला दिया कि बिना अपनी भूमि के, बिना अपने राष्ट्र के, वे कभी सुरक्षित नहीं रहेंगे।

1948 में इज़राइल बना। लेकिन यहाँ एक त्रासदी थी: जो भूमि यहूदियों को दी गई, उस पर फ़िलिस्तीनी पहले से रहते थे। एक क़ौम की मुक्ति दूसरी क़ौम का विस्थापन बन गई। यह वह घाव था जो आज तक नहीं भरा। और विडम्बना ये की ये कहानी इतनी सी ही नहीं है ना और ही इतनी सरल।




भाग दो: अमेरिका का पहला पाप — 1953 का तख़्तापलट


यदि आप पूछें कि अमेरिका और ईरान के बीच नफ़रत की बुनियाद कब पड़ी, तो उत्तर है: 19 अगस्त, 1953।

ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग़ एक लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए नेता थे। उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया — ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण। उन्होंने कहा: "हमारी ज़मीन का तेल, हमारा होगा।"

ब्रिटेन घबरा गया। और उसने अमेरिका को मना लिया।

CIA ने Operation AJAX चलाया। मोसादेग़ की सरकार को गिरा दिया गया। शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता में वापस लाया गया — एक ऐसा शासक जो अमेरिका का कठपुतला था।क्या आप को वेनेजुएला का घटनाक्रम याद आया?

अमेरिका की ग़लती #1: एक लोकतांत्रिक सरकार को गिराकर एक तानाशाह को समर्थन देना।

शाह ने 25 साल तक ईरान पर राज किया। उसकी गुप्त पुलिस SAVAK ने हज़ारों लोगों को यातनाएँ दीं। अमेरिका ने आँखें मूँद लीं — क्योंकि शाह "अमेरिका का तानाशाह" था। लेकिन इतिहास हमेशा बदला लेता है।




भाग तीन: 1979 — वह क्रांति जिसने दुनिया बदल दी


1 फ़रवरी, 1979 को जब आयतुल्लाह ख़ुमैनी का विमान तेहरान उतरा, तो लाखों लोग सड़कों पर थे।

यह सिर्फ़ एक सरकार का बदलना नहीं था। यह एक सभ्यतागत विद्रोह था — पश्चिम के ख़िलाफ़, उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़, और उस अपमान के ख़िलाफ़ जो 1953 से ईरानी दिलों में जमा हो रहा था।

नवम्बर 1979 में ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर क़ब्ज़ा कर लिया। 444 दिन तक 52 अमेरिकी बंधक रहे।

अमेरिका हतप्रभ था। उसे समझ नहीं आ रहा था; वह इस तरंह सोच रहे थे: "हम इतने अच्छे लोग हैं, हमसे इतनी नफ़रत क्यों?"

यह इंसानो की दूसरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है: अपनी ग़लतियों को याद न रखना, लेकिन दूसरों से यह उम्मीद रखना कि वे भूल जाएँ।

ईरान की ग़लती: क्रांति के जोश में ईरान ने तर्क और संवाद को धर्म की आग में जला दिया। ख़ुमैनी ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई जहाँ "वेलायत-ए-फ़क़ीह" — यानी धार्मिक नेता की सर्वोच्चता — को लोकतंत्र से ऊपर रखा गया। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जो आंतरिक असहमति को देशद्रोह मानती थी।वेलायत-ए-फ़क़ीह— वक्तिगत तौर पर ये किसी को उचित लग सकती है और किसी दूसरे को बिलकुल विपरीत।




भाग चार: इराक़-ईरान युद्ध और अमेरिका का दोहरा खेल (1980–1988)


जब सद्दाम हुसैन ने 1980 में ईरान पर हमला किया, तो अमेरिका ने दोनों तरफ़ खेला। एक ओर उसने सद्दाम को हथियार दिए — यहाँ तक कि रासायनिक हथियार बनाने में मदद की जो ईरानी सैनिकों और कुर्द नागरिकों पर इस्तेमाल हुए। दूसरी ओर, Iran-Contra Affair में अमेरिका ने गुपचुप ईरान को भी हथियार बेचे।

अमेरिका की ग़लती: नैतिकता को रणनीति से बदलना। जब आप हर उस व्यक्ति को हथियार देते हैं जो आपके दुश्मन का दुश्मन हो, तो आप एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जहाँ हर कोई हथियारबंद है और कोई सुरक्षित नहीं।

8 साल के इस युद्ध में 10 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए।




भाग पाँच: इज़राइल का उदय और फ़िलिस्तीन का दर्द (1948–2000)


इज़राइल की कहानी मानव इतिहास की सबसे जटिल कहानियों में से एक है। एक ओर, यहूदी लोगों ने जो 2000 वर्षों की यातना झेली — रोम, स्पेन, रूस, जर्मनी — उसके बाद उनकी अपनी मातृभूमि की माँग न्यायसंगत थी। दूसरी ओर, Nakba — 1948 में 7 लाख से ज़्यादा फ़िलिस्तीनियों का विस्थापन — एक ऐसा घाव है जिसे इज़राइल ने कभी स्वीकार नहीं किया।

इज़राइल की ग़लती: बस्तियों का निर्माण। 1967 के युद्ध के बाद इज़राइल ने West Bank और Gaza पर क़ब्ज़ा किया। तब से लेकर आज तक वह फ़िलिस्तीनी भूमि पर यहूदी बस्तियाँ बनाता रहा — जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार अवैध हैं। इसने हर बार जब शांति वार्ता शुरू हुई, उसे तोड़ा।

इज़राइल की ग़लती: Gaza की घेराबंदी। 2006 के बाद से Gaza — जहाँ 23 लाख लोग रहते हैं — को एक खुली जेल में बदल दिया गया। भोजन, दवाइयाँ, बिजली — सब पर नियंत्रण। जब आप 20 लाख लोगों को दशकों तक घेरे में रखते हैं, तो आप हिंसा को जन्म देते हैं — और फिर उस हिंसा को अपने अत्याचार का औचित्य बनाते हैं।




भाग छः: 9/11 और "आतंक के विरुद्ध युद्ध" का भ्रम (2001–2003)


11 सितम्बर, 2001 को जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरा, तो पूरी दुनिया स्तब्ध थी। अमेरिका का दर्द वास्तविक था। लेकिन जो जवाब आया, वह भावनाओं से चला — बुद्धि से नहीं।

अमेरिका की ग़लती: इराक़ पर हमला।

9/11 में 19 में से 15 हमलावर सऊदी अरब के नागरिक थे। ओसामा बिन लादेन सऊदी था। लेकिन अमेरिका ने हमला किया इराक़ पर — एक देश जिसका 9/11 से कोई संबंध नहीं था। "Weapons of Mass Destruction" — जो कभी मिले नहीं।

इराक़ युद्ध ने एक स्थिर राज्य को नष्ट कर दिया, ISIS के उदय की ज़मीन तैयार की, ईरान को इराक़ में असीमित प्रभाव दे दिया, और लाखों नागरिकों की जानें लीं। यह इतिहास की सबसे महंगी रणनीतिक ग़लतियों में से एक थी।




भाग सात: ईरान का परमाणु सपना (2003–2015)


ईरान के नेताओं ने 2003 में इराक़ की तबाही देखी और एक सबक़ सीखा: "जिसके पास परमाणु हथियार हैं, उसे कोई नहीं छूता।"

उत्तर कोरिया को देखो — कोई हमला नहीं। इराक़ को देखो — नष्ट। लीबिया को देखो — नष्ट।

ईरान की ग़लती: परमाणु कार्यक्रम को पारदर्शी न रखकर और IAEA के साथ सहयोग न करके, ईरान ने पूरी दुनिया में अपनी छवि एक ज़िम्मेदार राष्ट्र की जगह एक ख़तरनाक शक्ति की बनाई।

2015 में JCPOA — परमाणु समझौता — हुआ। यह कूटनीति की एक बड़ी जीत थी। लेकिन फिर 2018 में Donald Trump ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया।

अमेरिका की ग़लती : एक काम करने वाले कूटनीतिक समझौते को तोड़ना। इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान ने एक बार फिर यूरेनियम संवर्धन शुरू किया।




भाग आठ: इज़राइल-हमास युद्ध 2023


7 अक्टूबर, 2023 को हमास ने इज़राइल पर वह हमला किया जो उसने कभी नहीं सोचा था। 1,200 इज़राइली नागरिक मारे गए। 250 से ज़्यादा बंधक बनाए गए।

इज़राइल का दर्द असली था। उसका ग़ुस्सा समझ में आता था। लेकिन जो जवाब आया — Gaza में 40,000 से ज़्यादा मौतें, अस्पतालों पर हमले, भोजन और पानी की नाकेबंदी — यह सब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के घोर उल्लंघन के रूप में दर्ज हुए।

इज़राइल की ग़लती: सामूहिक दंड। हमास के पापों की सज़ा पूरे फ़िलिस्तीनी आम नागरिक को देना — यह न सिर्फ़ नैतिक रूप से ग़लत है, बल्कि रणनीतिक रूप से भी मूर्खतापूर्ण है। आतंकवाद तब और बढ़ता है जब जनता के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचता।

अमेरिका की ग़लती #5: जब UN में युद्धविराम प्रस्ताव आए, अमेरिका ने Veto किया। एक ओर "नियम-आधारित विश्व व्यवस्था" की बात, दूसरी ओर अपने सहयोगी के लिए नियमों को तोड़ने की छूट — यह दोहरापन अमेरिका की विश्वसनीयता को हर दिन नष्ट करता है।




भाग नौ: ईरान की छाया — प्रॉक्सी युद्ध


ईरान सीधे लड़ाई नहीं लड़ता — वह Hezbollah (लेबनान), Hamas (Gaza), Houthis (यमन), और PMF (इराक़) के ज़रिए लड़ता है।

ईरान की ग़लती: प्रॉक्सी समूहों को हथियार और धन देकर, ईरान ने यमन में भूख से मरते बच्चों की त्रासदी को और गहरा किया, लेबनान को एक राज्य के भीतर राज्य में बदल दिया, और इराक़ की संप्रभुता को खोखला किया।

ईरान की ग़लती: अपनी जनता के साथ व्यवहार। 2009 की हरित क्रांति, 2019-2020 के विरोध प्रदर्शन, 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद "ज़न, ज़िंदगी, आज़ादी" आंदोलन — इन सभी को कुचला गया। एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई की बात करे और अंदर से अपनी बेटियों को जेलों में डाले — वह नैतिक अधिकार खो देता है।




भाग दस: वह प्रश्न जो कोई नहीं पूछना चाहता


यहाँ एक असुविधाजनक सच है:

तीनों पक्षों ने एक ही ग़लती बार-बार की — अपनी कहानी को "पूर्ण सत्य" मानना।

अमेरिका को लगा कि वह "स्वतंत्रता और लोकतंत्र" का मसीहा है — लेकिन उसने 1953 में एक लोकतंत्र को कुचला, 1980 में एक तानाशाह को रासायनिक हथियार दिए, और 2003 में झूठ बोलकर एक देश को नष्ट किया।

ईरान को लगा कि वह "साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध" का प्रतीक है — लेकिन उसने अपने नागरिकों को दबाया, पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाई, और धर्म को राजनीतिक नियंत्रण का हथियार बनाया।

इज़राइल को लगा कि वह "2000 साल के उत्पीड़न का जवाब" है — लेकिन उसने ख़ुद उत्पीड़क बनने की राह चुनी, बस्तियाँ बनाईं, और Gaza को एक खुली जेल में बदल दिया।

जब हर पक्ष सिर्फ़ अपना दर्द देखे और दूसरे का नहीं — तो युद्ध अनंत हो जाता है।




उपसंहार: आग और दर्पण


एक पुरानी फ़ारसी कहावत है: "जब आग लगती है, तो गीला और सूखा दोनों जलते हैं।"

अमेरिका, ईरान और इज़राइल — तीनों ने आग जलाई है। तीनों जले हैं। और तीनों अभी भी माचिस हाथ में लिए बैठे हैं।

इंसान कहानियाँ बुन सकता है — ऐसी कहानियाँ जो करोड़ों लोगों को एकजुट करें। लेकिन उसकी कमज़ोरी यह है कि वह उन्हीं कहानियों का दास भी बन जाता है।

अमेरिका की कहानी: "हम स्वतंत्रता के रक्षक हैं।" ईरान की कहानी: "हम साम्राज्यवाद के विरुद्ध योद्धा हैं।" इज़राइल की कहानी: "हम अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं।"

तीनों कहानियों में सच है। तीनों कहानियाँ अधूरी हैं।

और जब तक ये तीनों राष्ट्र अपनी कहानी से बाहर निकलकर दूसरे का दर्द नहीं देख पाते — तब तक यह आग जलती रहेगी।





मध्य-पूर्व की यह त्रासदी किसी एक खलनायक की कहानी नहीं है। यह उस मानवीय कमज़ोरी की कहानी है जो हम सबमें है — भय, अहंकार, और यह विश्वास कि हम सही हैं और बाकी सब ग़लत।

जिस दिन हम यह स्वीकार करेंगे कि हर पक्ष ने ग़लतियाँ की हैं — उस दिन शायद शांति की पहली किरण दिखे।